Sunday, August 14, 2011

क्यों तडपा तडपा के हलाल करती है मुझे


रात पूरी हो गयी बात पूरी होने से पहले 
जिए जाते हैं अब अधूरे ख़्वाब कि चाहत लिए 

उदासी भी इस दिल को भाती गयी 
बैचैनी ख़्वाबों ख्यालों में छाती गयी 

तेरे ख्यालों में भीगता रहता 
कभी संभलता कभी फिसलता 

तेरे अक्स से महकता हुआ सा 
धीमी आँच मैं पकता हुआ सा 

ये दूरिय क्यों नहीं पिघल जाती
ये शबनम क्यों नहीं घुल जाती 

विरह का इक लम्हा भी जनम समां लगता है 
मिलन कि आस में ये ज़हर भिऊ अमृत लगता है 

ज़ालिम ज़ोर का इक झटका अब मार दे 
क्यों तडपा तडपा के हलाल करती है मुझे  

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