Saturday, June 15, 2013

कि याद रखोगी तुम हमें

अजीब खेल है ये मोहब्बत भी
थके एक, पर हार होती है दोनों की ही

शुक्र है मोहब्बत नहीं हुई तुम्हे हमसे कभी
जिंदगी के सबसे बड़े दर्द से तुम बची हो हुई

तुम खुश रहो, सदा हंसती ही रहो, ये दुआ है मेरी
ख्याल रखना, तुम्हे मिल जाए न कोई तुम जैसा ही

दिल की दास्ताँ क्या खूब बयां करती हो
कभी हबीब, कभी हमदम, तो कभी रक़ीब कहा करती हो 

परवाने को शमा पे जल कर कुछ तो मिलता होगा
मोहब्बत में मर कर ही शायद सकून मिलता होगा

मुझसे मेरा हाल न पूछा करो कभी
मुद्दत हो गयी, मैं खुद से मिला ही नहीं

शायद फिर कहीं किसी मोड़ पर मिल जाओ तुम
पर याद रखना कि मुझे अब खो चुकी हो तुम

पलट के इक बार भी नहीं देखेंगे हम तुम्हे
भुला देंगे ऐसा तुम को, कि याद रखोगी तुम हमें

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